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आजीविका डबरी बनी मनमोहन की खुशहाली का आधारसिंचाई के साथ मछली पालन और सब्जी उत्पादन से बढ़ेगी आय की संभावनाएं

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आजीविका डबरी बनी मनमोहन की खुशहाली का आधार
सिंचाई के साथ मछली पालन और सब्जी उत्पादन से बढ़ेगी आय की संभावनाएं

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जांजगीर-चांपा,  ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के साथ-साथ जल संरक्षण और आजीविका के नए अवसर उपलब्ध कराने में रोजगार गारंटी योजना महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। बम्हनीडीह विकासखंड के ग्राम बघौदा निवासी मनमोहन हंशराज के खेत में बनी आजीविका डबरी इसका प्रेरक उदाहरण बनकर सामने आई है।
मनमोहन के खेत में करीब 0.30 एकड़ भूमि पर व्यक्तिगत आजीविका डबरी का निर्माण कराया गया। वर्ष 2024-25 में इसके लिए 2.76 लाख रुपये की स्वीकृत राशि से कार्य कराया गया, जिसमें 2.53 लाख रुपये मजदूरी और 23 हजार रुपये सामग्री पर खर्च किए गए। इस निर्माण कार्य से करीब 1003 मानव दिवस का रोजगार भी सृजित हुआ।
खेती में सिंचाई की समस्या हुई दूर

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आजीविका डबरी बनने से पहले मनमोहन के खेतों में सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं हो पाता था। बारिश पर निर्भरता के कारण खेती प्रभावित होती थी। डबरी बनने के बाद अब खेतों में सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता बेहतर हुई है, जिससे खेती को स्थायित्व मिला है और फसल उत्पादन की संभावनाएं बढ़ी हैं।
मछली पालन और सब्जी उत्पादन से अतिरिक्त आय की राह
मनमोहन ने डबरी के आसपास अरहर और हल्दी की खेती शुरू कर दी है। वहीं डबरी में वर्तमान में मछली पालन किया जा रहा है। आने वाले गर्मी के मौसम में डबरी के पानी का उपयोग कर सब्जी उत्पादन करने की भी तैयारी है।
इस तरह एक ही परिसंपत्ति का उपयोग सिंचाई, मछली पालन और कृषि गतिविधियों के लिए किया जा रहा है। इससे परिवार के लिए आय के अतिरिक्त स्रोत विकसित होने की संभावना बढ़ी है।


125 दिवस रोजगार से आर्थिक मजबूती की उम्मीद
मनमोहन का कहना है कि विकसित भारत जी राम जी योजना के आने के बाद उन्हें गांव में ही 300 रुपये की मजदूरी और 125 दिवस का रोजगार मिलने की उम्मीद है, जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति को और मजबूती मिलेगी।
मनमोहन बताते हैं कि आजीविका डबरी बनने से उनके खेतों में पानी की समस्या काफी हद तक दूर हो गई है। अब खेती के साथ मछली पालन, अरहर और हल्दी की खेती तथा भविष्य में सब्जी उत्पादन के माध्यम से आजीविका के नए रास्ते तैयार हुए हैं।
आजीविका डबरी का यह उदाहरण बताता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में तैयार की गई उपयोगी परिसंपत्तियां केवल जल संरक्षण और रोजगार तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि लंबे समय तक कृषि, आयवृद्धि और आत्मनिर्भरता का आधार बन सकती हैं।

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