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छत्तीसगढ़धरसींवा

अंचल में धूमधाम से मनाया गया हलषष्ठी (कमरछठ) व्रत-पूजन

Halshasthi (Kamarchhat) fast and worship was celebrated with great pomp in the region.

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फर्स्ट छत्तीसगढ़ न्यूज से मोहम्मद उस्मान सैफी 

सिलयारी। कुथरेल, सिलयारी अंचल सहित आसपास के गांवों में बुधवार को हलषष्ठी (कमरछठ) का पर्व श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर पर माताओं एवं बहनों ने संतान की दीर्घायु, सुख-समृद्धि तथा परिवार में सुख-शांति की कामना को लेकर विधि-विधान से व्रत रखकर माता हलषष्ठी की पूजा-अर्चना की। पूजा के पश्चात श्रद्धालुओं को माता हलषष्ठी की कथा का श्रवण कराया गया।

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कथा में बताया गया कि भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को हलषष्ठी अथवा कमरछठ व्रत मनाने की परंपरा है। माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, सुख-समृद्धि एवं परिवार की खुशहाली की कामना से यह व्रत रखती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन विशेष रूप से भैंस के दूध, दही और घी सहित पारंपरिक पूजन सामग्री का उपयोग किया जाता है।

राजा चंद्रव्रत के पुत्र के बलिदान की कथा

कथा वाचन के दौरान बताया गया कि आर्यावर्त के राजा चंद्रव्रत के पुत्र ने अपने पिता के धर्म और मान-सम्मान की रक्षा के लिए स्वयं को सूखे तालाब में वरुण देव को समर्पित कर दिया। इसके बाद राजा-रानी ने माता हलषष्ठी का विधि-विधान से व्रत एवं पूजन किया। माता की कृपा से राजा-रानी को उनका पुत्र पुनः जीवित अवस्था में प्राप्त हुआ। इस कथा के माध्यम से माता हलषष्ठी की महिमा और उनकी कृपा का वर्णन किया गया।

इसी क्रम में माता देवकी से जुड़ी कथा का भी वर्णन किया गया। कथा में बताया गया कि माता देवकी ने कारागृह में रहते हुए मानसिक रूप से माता हलषष्ठी का व्रत एवं पूजन किया था। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसके प्रभाव से आगे चलकर भगवान श्रीकृष्ण ने उनके गर्भ से अवतार लिया और धरती पर धर्म की स्थापना की।

कथा वाचन के दौरान माता हलषष्ठी की महिमा से जुड़ी छह अलग-अलग धार्मिक कथाओं का श्रवण कराया गया। कथा सुनकर उपस्थित श्रद्धालु भाव-विभोर एवं मंत्रमुग्ध हो गए।

हलषष्ठी पर्व को लेकर गांवों में सुबह से ही उत्साह का माहौल रहा। पूजा-अर्चना एवं कथा श्रवण के लिए बड़ी संख्या में माताएं, बहनें और ग्रामीणजन एकत्रित हुए। पूरे अंचल में दिनभर भक्तिमय वातावरण बना रहा।

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