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जशपुर में ‘VIP’ बंगला ईंट भट्ठों का खेल! बिना अनुमति सालों से चल रहा करोड़ों का अवैध कारोबार

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फर्स्ट छत्तीसगढ़ न्यूज से शैलेंद्र कुमार

जशपुर। जिले में लाल ईंट के अवैध कारोबार को लेकर अब गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। फरसाबहार क्षेत्र के नागलोक इलाके के पमशाला, कंदईबहार, अमडीहा, खुटगाँव सहित आसपास के कई गांवों में वर्षों से “VIP” नाम से बंगला ईंट भट्ठों का संचालन किया जा रहा है।

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स्थानीय सूत्रों के अनुसार इन भट्ठों के पीछे बाहरी राज्यों के लोगों की भूमिका बताई जा रही है, जो यहां कुम्हार समाज के नाम का सहारा लेकर आवासीय निर्माण की आड़ में बड़े पैमाने पर व्यावसायिक ईंट निर्माण का काम करा रहे हैं। बताया जाता है कि इन भट्ठों में हर साल करोड़ों की संख्या में ईंटों का उत्पादन कर खुले बाजार में बिक्री की जा रही है।

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नियमों के अनुसार किसी भी ईंट भट्ठे के संचालन के लिए ग्राम पंचायत, स्थानीय निकाय और संबंधित विभागों से अनुमति लेना अनिवार्य होता है। लेकिन संबंधित ग्राम पंचायतों के सरपंच और सचिवों का कहना है कि उनके अभिलेखों में इन भट्ठों के संचालन से जुड़ी कोई वैध स्वीकृति दर्ज नहीं है। इसके बावजूद वर्षों से इनका संचालन जारी रहना कई सवालों को जन्म दे रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि नियमों की अनदेखी कर यह कारोबार खुलेआम संचालित किया जा रहा है, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है। ग्रामीणों का कहना है कि ईंट निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर जंगलों से लकड़ी काटी जा रही है, जिससे वन संपदा को नुकसान पहुंच रहा है। कई स्थानों पर कोयले का अवैध भंडारण भी किया जा रहा है और जंगल की जमीन का उपयोग भट्ठों के संचालन के लिए किए जाने की चर्चा भी सामने आ रही है। पर्यावरण से जुड़े लोगों का मानना है कि बिना किसी नियामक नियंत्रण के इस प्रकार की गतिविधियां क्षेत्रीय पर्यावरण के लिए खतरा बन सकती हैं।

इतना ही नहीं, ईंट निर्माण के लिए मिट्टी की खुदाई करते समय नदी और नालों के किनारों को भी नहीं बख्शा जा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई जगहों पर नदी के किनारों से मिट्टी निकालकर ईंट बनाई जा रही है, जिससे प्राकृतिक संरचना प्रभावित होने की आशंका बढ़ रही है। यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाले समय में पर्यावरणीय असंतुलन की स्थिति पैदा हो सकती है।
इस पूरे मामले में खनिज विभाग को भी राजस्व के नुकसान की आशंका जताई जा रही है। जानकारी के अनुसार मिट्टी और अन्य खनिज संसाधनों के उपयोग पर शासन को रॉयल्टी मिलती है, लेकिन अवैध रूप से संचालित इन भट्ठों के कारण शासन को लाखों रुपये की रॉयल्टी का नुकसान हो रहा है। इसके बावजूद कार्रवाई का अभाव लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।

सबसे चौंकाने वाली बात तब सामने आती है जब संबंधित विभाग के अधिकारियों से इन भट्ठों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर चर्चा की जाती है। सूत्रों के अनुसार अधिकारियों का तर्क है कि यदि इन बंगला ईंट भट्ठों को बंद कर दिया गया तो आम जनता को निर्माण कार्यों के लिए ईंट उपलब्ध होने में परेशानी हो सकती है। साथ ही यह भी कहा जाता है कि ऐसी स्थिति में चिमनी ईंट भट्ठा संचालक ईंटों के दाम बढ़ा सकते हैं, जिससे बाजार में कीमतों में भारी वृद्धि हो सकती है।
हालांकि अधिकारियों का यह तर्क अब कई सवालों को जन्म दे रहा है। यदि कोई गतिविधि नियमों के विरुद्ध है तो क्या केवल बाजार संतुलन के नाम पर उसे जारी रहने देना उचित है? स्थानीय नागरिकों का कहना है कि हर वर्ष जांच के नाम पर अधिकारियों का दौरा तो होता है, लेकिन कार्रवाई चालान तक ही सीमित रह जाती है।
अब यह पूरा मामला प्रशासनिक जवाबदेही की कसौटी बनता जा रहा है। देखना होगा कि संबंधित विभाग इन कथित अवैध बंगला ईंट भट्ठों के खिलाफ कोई ठोस और निर्णायक कार्रवाई करते हैं या फिर कार्रवाई के नाम पर औपचारिकताओं का सिलसिला यूं ही चलता रहेगा। फिलहाल क्षेत्र में एक ही सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है  आखिर “VIP” ईंट के असली आका कौन हैं, जिनके संरक्षण में यह कारोबार वर्षों से फल-फूल रहा है।

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