धान की कटाई के बाद खेतों को परती छोड़ने के बजाय उपलब्ध अवशिष्ट नमी एवं प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग कर दूसरी एवं तीसरी फसल लेने को बढ़ावा देने के उद्देश्य से “संरक्षण कृषि प्रौद्योगिकी द्वारा धान परती प्रणाली प्रबंधन के तहत रबी उत्पादन तकनीक ” कार्यक्रम का आयोजन 3 नवंबर को कृषि विज्ञान केन्द्र, डूमरबहार, जशपुर में किया गया। कार्यक्रम में पत्थलगाँव विकासखंड के कुमेकला, कमतरा, बिछीकानी एवं डूमरबहार के 74 किसानों ने भाग लिया, जिनमें 05 महिला किसान भी शामिल थीं।
कार्यक्रम का आयोजन भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् का पूर्वी अनुसंधान परिसर, कृषि प्रणाली का पहाड़ी एवं पठारी अनुसंधान केन्द्र, राँची (ICAR-RCER, FSRCHPR) द्वारा कृषि विज्ञान केन्द्र, डूमरबहार, पत्थलगांव, जिला जशपुर तथा कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, कुनकुरी के संयुक्त तत्वावधान मे आयोजित की गई। यह कार्यक्रम “कृषि संरक्षण पर सहभागी अनुसंधान मंच: पूर्वी क्षेत्र में धान-परती प्रणाली के अंतर्गत कृषि विधियों का मूल्यांकन” परियोजना के तहत आयोजित हुआ।
कार्यक्रम की शुरुआत कृषि विज्ञान केन्द्र, पत्थलगांव के प्रभारी डॉ. आर.के. भगत के स्वागत संबोधन से हुई। उन्होंने किसानों एवं अतिथियों का स्वागत करते हुए ‘रबी उत्पादन तकनीक कार्यक्रम की रूपरेखा एवं उद्देश्यों के साथ साथ कृषि विज्ञान केंद्र मे संचालित विभिन्न गतिविधियों के बारे मे विस्तारपूर्वक जानकारी दी।
कृषि प्रणाली का पहाड़ी एवं पठारी अनुसंधान केन्द्र, राँची (ICAR-RCER, FSRCHPR) के प्रधान वैज्ञानिक एवं परियोजना के सह अन्वेशक डॉ. बी.के. झा ने परियोजना के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए धान-परती क्षेत्रों के हरितीकरण की आवश्यकता बताई। उन्होंने छतीसगढ़ के कंडोरा मे संरक्षण कृषि तकनीक द्वारा कीय गए परियोजना के अनुसंधान जिसमे धान के कटाई के पश्चात कम पानी मे सफलतापूर्वक दलहनी एवं तिलहनी फसले की सफल खेती को जशपुर के अन्य क्षेत्रों में अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने किसानों को धान की कटाई के बाद खेतों में दूसरी फसल लेने के लिए प्रेरित किया। साथ ही किसानों के सामने आने वाली सामाजिक एवं तकनीकी समस्याओं के त्वरित एवं व्यावहारिक समाधान भी सुझाए। उन्होंने कहा कि धान-परती क्षेत्रों को हरा-भरा बनाने के लिए किसानों की सक्रिय भागीदारी जरूरी है। उन्होंने जैविक उपायों के माध्यम से मृदा स्वास्थ्य सुधारने पर विशेष जोर दिया और कहा कि स्वस्थ मृदा दूसरी एवं तीसरी फसल की सफलता की आधारशिला है। उन्होंने किसानों से उन्नत संरक्षण कृषि तकनीकों को अपनाने के लिय प्रेरित किया तथा संरक्षण कृषि के लाभों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि पूर्वी भारत के जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में धान के बाद दूसरी एवं तीसरी फसल की सफलता के लिए जल संचयन, अवशिष्ट नमी का संरक्षण तथा संरक्षण कृषि तकनीकों का उपयोग महत्वपूर्ण है। इन तकनीकों से धान की फसल की कटाई के बाद उपलब्ध नमी का दक्ष उपयोग करते हुए धान-परती क्षेत्रों में फसल विविधीकरण को बढ़ावा दिया जा सकता है।
कार्यक्रम के दौरान डॉ. छत्रपाल सिंह पुहुप द्वारा किसानों को रबी फसलों की उन्नत खेती के संबंध में विस्तारपूर्वक जानकारी दी गई। उन्होंने बताया कि रबी फसलों की अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए समय पर बुवाई, उन्नत किस्मों का चयन, बीजोपचार एवं संतुलित उर्वरक प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने गेहूं, चना, मसूर, सरसों एवं अन्य रबी फसलों की वैज्ञानिक खेती के बारे में जानकारी देते हुए किसानों को उचित कृषि तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने किसानों को फसलों में सिंचाई का उचित प्रबंधन, खरपतवार नियंत्रण तथा कीट एवं रोगों की समय पर पहचान और रोकथाम के उपायों के बारे में बताया। साथ ही मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के लिए जैविक खाद एवं संतुलित पोषक तत्वों के उपयोग पर जोर दिया। उन्होंने किसानों से कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा सुझाई गई वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाकर कम लागत में अधिक उत्पादन एवं बेहतर आर्थिक लाभ प्राप्त करने का आह्वान किया।
कार्यक्रम के दौरान किसानों के साथ धान-परती प्रबंधन, संरक्षण कृषि, मृदा स्वास्थ्य, जल संरक्षण तथा दूसरी एवं तीसरी फसल से संबंधित तकनीकी विषयों पर संवाद किया गया। किसानों ने अपनी स्थानीय समस्याएं एवं अनुभव साझा किए और वैज्ञानिकों से समाधान प्राप्त किए।
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम मे किसानों को रबी फसल उत्पादन हेतु सरसों के उन्नत बीज 130 किलो, चना 90 किलो, मसूर 30 किलो और टीसी 30 किलो साथ मे ड्राइलैंड वीडर 30 की संख्या मे किसानों को वितरित की गई।
कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केन्द्र, डूमरबहार की डॉ. अनिता लकड़ा, विषय वस्तु विशेषज्ञ (खाद्य प्रसंस्करण), डॉ नागेंद्र कुमार, विषय वस्तु विशेषज्ञ (पशुपालन), यंग प्रोफेशनल किरण साहू, श्री मनोज नारंगे एव श्री राजकुमार यादव संरक्षित कृषि परियोजना के सीनियर रेसर्च फ़ेलो उपस्थित रहे।
डॉ भगत ने कार्यक्रम का संचालन एवं समन्वय किया तथा अंत में धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी अतिथियों, वैज्ञानिकों, किसानों एवं सहयोगी संस्थानों के प्रति आभार व्यक्त किया।
कार्यक्रम का मुख्य संदेश रहा कि धान कटाई के बाद उपलब्ध अवशिष्ट नमी का संरक्षण, जल संचयन, संरक्षण कृषि एवं सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को अपनाकर धान-परती क्षेत्रों को उत्पादक बनाया जा सकता है। इससे किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ मृदा स्वास्थ्य और क्षेत्र की कृषि स्थिरता को भी मजबूत किया जा सकता है।