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गाँव में चर्चा तेज—शासकीय भूमि पर कब्जा और धार्मिक प्रतीक स्थापना को लेकर उठे सवाल।

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“अरे ओ पंचायत वाले… गाँव वालों को तो तुम्हारा डर नहीं, लेकिन शासकीय जमीन पर कब्जे की कहानी सुनकर आज मल्दा ‘अ’ पंचायत में सबका माथा ठनक गया है!”

मल्दा ‘अ’ ग्राम पंचायत की शासकीय भूमि—तालाब पार की जमीन… जहाँ अवैध कब्जा कर एक मकान निर्माण का काम जोरों पर चल रहा था। पंचायत ने रोका… समझाया… नियमों का हवाला दिया।
पर सामने वाले ने कहा—
‘जो डर गया, समझो मर गया!’

लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आया… जब रातों-रात उसी कब्जे वाली जगह पर गुरु घासीदास जी का जय स्तंभ खड़ा हो गया!
हाँ, बिल्कुल… रात होने से पहले जमीन पर मजदूर थे, और सुबह होते-होते वहाँ आस्था का प्रतीक चमक रहा था।

गाँव वाले?
पूरा गाँव इस कदम की सराहना कर रहा है। लोग बनाने वालों को हीरो बता रहे हैं— जैसे किसी फिल्म में एंट्री हो और भीड़ खुद-ब-खुद ताली बजाने लगे।

लेकिन असली सवाल यहीं से शुरू होता है—
क्या शासकीय भूमि पर कब्जा सही है?
क्या आस्था का सहारा लेकर नियमों को तोड़ा जा सकता है?
और पंचायत की अनदेखी कर शुरू किया गया मकान निर्माण… क्या ये “कानून से ऊपर” वाली सोच नहीं?

गाँव में चर्चा तेज है…
और मल्दा ‘अ’ की ये कहानी अब पूरे इलाके में “गब्बर इज़ बैक” की तरह गूंज रही है—

“जब पंचायत मना करे… और फिर भी कब्जा हो जाए… तो समझ लो, सिस्टम को एक बार फिर चुनौती मिली है।”

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