Advertisement Carousel
धर्म

सुबह बनाम शाम: छठ पूजा में सूर्य अर्घ्य करने का सही तरीका

Ad

लोक आस्था का महापर्व छठ  25 अक्टूबर से ‘नहाय-खाय’ के साथ शुरू हो रहा है और 28 अक्टूबर को ‘उषा अर्घ्य’ के साथ इसका समापन होगा. चार दिनों तक चलने वाले इस कठिन व्रत में सूर्य देव और छठी मैया की उपासना की जाती है. इस पर्व की सबसे अनूठी और महत्वपूर्ण रीत है डूबते हुए सूर्य (संध्या अर्घ्य) और उगते हुए सूर्य (उषा अर्घ्य) को अर्घ्य देना. हिंदू धर्म में आमतौर पर उगते सूर्य को ही जल चढ़ाया जाता है, लेकिन छठ ही एकमात्र ऐसा पर्व है, जिसमें पहले अस्ताचलगामी (डूबते) सूर्य और फिर उदयगामी (उगते) सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. आइए जानते हैं छठ पूजा में सुबह और शाम की पूजा में क्या अंतर है.

Advertisements

छठ पूजा: शाम की पूजा (डूबते सूर्य को अर्घ्य) तीसरा दिन
छठ पर्व के तीसरे दिन, यानी कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. इसे संध्या अर्घ्य भी कहते हैं.

Advertisements

मान्यता है कि शाम के समय सूर्य देव अपनी पत्नी प्रत्यूषा के साथ होते हैं, जो सूर्य की अंतिम किरण हैं. इसलिए इस अर्घ्य को प्रत्यूषा अर्घ्य भी कहा जाता है. डूबते सूर्य को अर्घ्य देना इस बात का प्रतीक है कि जीवन में हर उत्थान (उगने) के बाद पतन (डूबना) निश्चित है और हमें अपने जीवन के उतार-चढ़ावों को स्वीकार करना चाहिए. इस अर्घ्य से भक्तों के जीवन से अंधकार दूर होता है.

इस दिन व्रती महिलाएं और पुरुष कमर तक पानी में खड़े होकर, बांस के सूप या पीतल की टोकरी में फल, ठेकुआ, गन्ना आदि पूजा सामग्री रखकर अर्घ्य देते हैं.

छठ पूजा: सुबह की पूजा (उगते सूर्य को अर्घ्य) चौथा दिन
छठ पर्व के चौथे और अंतिम दिन, यानी सप्तमी तिथि को उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. इसे उषा अर्घ्य कहा जाता है.

धार्मिक मान्यता है कि सूर्योदय के समय सूर्य देव अपनी पत्नी ऊषा के साथ होते हैं, जो सूर्य की पहली किरण हैं और जिन्हें भोर की देवी भी कहा जाता है. इसलिए इसे उदयगामी अर्घ्य या ऊषा अर्घ्य कहते हैं. उगते सूर्य को अर्घ्य देना नवजीवन, वर्तमान और सुनहरे भविष्य का प्रतीक है. व्रती सूर्य देव से शक्ति, स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और संतान के दीर्घायु होने का आशीर्वाद मांगते हैं. उदयगामी अर्घ्य देने के बाद ही छठ महापर्व का विधिवत समापन होता है और व्रती अपना 36 घंटे का निर्जला व्रत खोलते हैं.

इस दिन व्रती फिर से नदी या तालाब में खड़े होकर, सूर्य की पहली किरण को दूध और जल से अर्घ्य देकर छठी मैया और सूर्य देव की आराधना करते हैं.

डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देने का महत्व
माना जाता है कि संध्या अर्घ्य जहां जीवन की कठिनाइयों को दूर करने की प्रार्थना है, वहीं उषा अर्घ्य सभी मनोकामनाओं की पूर्ति और नए जीवन के आरंभ का प्रतीक है. इस प्रकार, छठ महापर्व न केवल सूर्य की उपासना का त्योहार है, बल्कि यह पवित्रता, अनुशासन, और जीवन के हर पड़ाव को सम्मान देने की भारतीय संस्कृति के गहरे मूल्यों को भी दर्शाता है.

Ad जय मेडिकल स्टोर स्थान: भारत माता चौक बिलासपुर रोड सारंगढ़
First Chhattisgarh News Ad

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button