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छत्तीसगढ़जांजगीर-चांपा

PWD की लीपा-पोती से टूटी सड़क बनी मौत का रास्ता ग्रामीणों का फूटा गुस्सा

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दीपक यादव बिलासपुर संभाग ब्यूरो चीफ की रिपोर्ट

लीपा-पोती कर पल्ला झाड़ा पीडब्ल्यूडी ने सड़क का सोल्डर टूटा, भारी वाहन काल बनकर दौड़ रहे। नो-एंट्री में भी एंट्री, ग्रामीणों की जान से खिलवाड़

जांजगीर-चांपा। सिवनी से नैला-बलौदा मार्ग पर सड़क की दुर्दशा ने ग्रामीणों का जीना मुहाल कर दिया है। लगातार हो रहे हादसे और धूल-मिट्टी में सनी ज़िंदगी से परेशान लोगों ने जब आंदोलन की चेतावनी दी, तो सार्वजनिक निर्माण विभाग (PWD) ने आनन-फानन में मरम्मत का काम शुरू किया। लेकिन यह काम महज़ दिखावा साबित हुआ। गड्ढों में गिट्टी डालकर रोलर चला देना और उसे मरम्मत बताना, ग्रामीणों की पीड़ा का मज़ाक उड़ाने जैसा है। सड़क का सबसे अहम हिस्सा, यानी किनारा (सोल्डर), अब भी टूटा पड़ा है, जहाँ से हर दिन छोटे वाहन और दुपहिया फिसलने का ख़तरा झेलते हैं।

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भारी वाहन काल बनकर दौड़ रहे

यह सड़क वैसे ही संकरी है, ऊपर से रोजाना ओवरलोड ट्रक और ट्रेलर बिना किसी रोक-टोक के दौड़ रहे हैं। ग्रामीण कहते हैं – “इन वाहनों की गर्जना हमारे लिए काल से कम नहीं है। जब-जब कोई ट्रक पास से निकलता है, हमारी साँसें अटक जाती हैं।” यह मार्ग अब लोगों के लिए जीवनरेखा से ज़्यादा मौत का रास्ता बन गया है।

नियमों की धज्जियां, प्रशासन मौन

प्रशासन ने घोषणा की थी कि सुबह 6 बजे से रात 11 बजे तक भारी वाहनों पर रोक (नो-एंट्री) लागू रहेगी। लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है। नो-एंट्री की पाबंदी सिर्फ़ कागज़ पर है, सड़क पर बड़े वाहन दिन-रात दौड़ रहे हैं। ट्रैफिक पुलिस और विभागीय अमला आँख मूंदकर सब देख रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि अधिकारी और भारी वाहन मालिकों की मिलीभगत साफ दिखाई देती है। लोगों ने तीखे शब्दों में कहा – “लगता है अधिकारी जेब में रखकर घूम रहे हैं, तभी तो कोई रोक-टोक नहीं।”

चक्का जाम टालना ही उद्देश्य था

हाल ही में ग्रामीणों ने आंदोलन की चेतावनी दी थी, जिसके बाद प्रशासन हरकत में आया। लेकिन सड़क मरम्मत का काम केवल चक्का जाम टालने की एक रणनीति साबित हुआ। वास्तविक समस्या जस की तस है। न तो सड़क का किनारा सुधारा गया, न ही भारी वाहनों पर अंकुश लगा।

जनहित याचिका का संकेत

ग्रामीणों का जिला प्रशासन से भरोसा उठ चुका है। कई ग्रामीण अब माननीय उच्च न्यायालय में जनहित याचिका (PIL) दाखिल करने की तैयारी में हैं। उनका कहना है कि जब शासन-प्रशासन को ग्रामीणों की जान की परवाह नहीं, तब न्याय केवल अदालत से ही मिल सकता है। “हमें अब भरोसा है तो सिर्फ़ कोर्ट पर, क्योंकि प्रशासन केवल आश्वासन देता है, काम नहीं करता।”

नैला चौकी प्रभारी के आश्वासन पर स्थगित हुआ आंदोलन

ग्रामीणों ने हाल ही में नैला चौकी प्रभारी विनोद जाटवर के आश्वासन पर आंदोलन को स्थगित किया था। लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि यह स्थगन अस्थायी है। यदि हालात नहीं सुधरे तो आंदोलन किसी भी वक्त भयावह रूप ले सकता है।

आक्रोश की आग को नहीं समझ पा रहा प्रशासन

ग्रामीणों का गुस्सा अब उबाल पर है। उनका कहना है कि शासन और प्रशासन उनकी पीड़ा और आक्रोश की आग को समझने में असफल हो रहा है। हालात यह हैं कि अब लोग नेताओं पर भी भरोसा नहीं कर रहे। ग्रामीणों का कहना है – “नेता चुनाव के वक्त आते हैं, मगर हमारी जान की लड़ाई हम खुद लड़ रहे हैं। अब अपना भाग्य हमें खुद तय करना है।”

“हमारी जान की कोई कीमत नहीं?”

गांव के बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक का यही सवाल है कि आखिर उनकी जान इतनी सस्ती क्यों मानी जा रही है। एक ग्रामीण ने आक्रोश में कहा – “क्या सरकार और प्रशासन को हमारी मौत का इंतज़ार है? हादसे होते हैं, लोग घायल होते हैं, लेकिन किसी की सुनवाई नहीं। अब अगर सड़क पर खून बहेगा तो उसकी ज़िम्मेदारी प्रशासन की होगी।”

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